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संपादकीय
06 Aug, 2026 5 मिनट पठन

बाल साहित्य और बच्चे अभिभावकों का दायित्व

डॉ. गर्ग
रचनाकार / लेखक

हम  बालसाहित्य रचनाकारों के समक्ष आज भी अनेक चुनौतियों है और जो-जो भी बाल साहित्य से कियों न किसी थ्य में जुड़े हैं वे सभी इस बात को लेकर हमेशा चिंतित राहते हैं कि बाल साहित्य चच्चों तक नहीं पहुंच रहा है। यह सव भी है कि निश्चित रूप से जितन्व बाल साहित्य लिखा जा रहा है और जितना प्रकाशित हो रहा है इस अनुपात में का बालकों तक तो निश्चित ही नहीं पहुँच रहा है। उसी में बाल साहित्य की पत्रिकाएँ भी है। आज कितने परिवारों में कोई बाल पत्रिका पहुँच रही है, कहने की आवश्यकता नहीं है। बच्चों को तो अधिकतर यह भी पता नहीं है कि उनके लिए बाल साहित्य जहाँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, वहीं उनके लिए कई बाल पत्रिकाएँ भी प्रकाशित हो रही हैं। यद्यपि मोबाइल के कारण अब पठनीयता कम ही नहीं समात प्रायः हो गयी है, लेकिन बाल पत्रिकाएँ निकल रही हैं और बहुत असही निकाल रही हैं।
बाल साहित्य चाहे पुस्तक रूप में हो अथवा पत्र-पत्रिकाओं के रूप में आज अपेक्षाकृत प्रचुर मात्रा में और मुरारतापूर्ण उपलब्ध है, फिर भी यह बच्चों तक नहीं पहुंच रहा है तो इसमें बच्चों का कोई दोष नहीं है। उन्हें तो इन सबका पता भी नहीं है। बच्चों तक बाल साहित्य पहुॅथाने का सबसे पहला दायित्व तो माता-पिता का है, अभिभावकों का है। लेकिन विडंबना यह है कि आज के अधिकतर माता-पिता को तो यहीं नहीं मालूम कि बाल साहित्य नाम की भी कोई चीज है और उससे बच्चों का जुड़ना बहुत आवश्यक है, क्योंकि बाल साहित्य बन्नों के लिए ही लिखा जा रहा है। अगर बाल साहित्य बच्चों तक नहीं पहुंच रहा है तो उसका लिखा जाना और प्रकाशित होना व्यर्थ ही है। लेकिन क्या ऐसा मानकर बालसाहित्य का लेखन और प्रव्धशन होना बंद हो जाना चाहिए? ऐसा करना तो बहुत ही बड़ी भूल होगी और यही कारण है कि बाल साहित्य की यह बत्रा दोनों स्तरों पर आज भी निरंतर है।
जब उपर्युक्त संदर्भ में हम गंभीरता से विचार करते हैं, तो मुझे लगता है कि आज बच्चों और अभिभावकों के बीच बाल साहित्य के एक सपन प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है। जब बच्चे और अभिभावक बाल साहित्य की पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं से परिचित होंगे और उनके महत्व को जानेंगे तो निश्चित ही वे अपने बच्चों को इसे उपलब्ध कराने की दृष्टि से भी जागरूक होंगे। इस तरह हमारी एक बहुत बड़ी चुनौती अथवा समस्या के समाधान की संभावनाएँ सहन ही सोन ली जाएंगी।
एक बात स्पष्ट है कि शिक्षा जब तक सर्वांगीण नहीं होती, तब तक का जीवन के समग्र विकास में सहायक नहीं हो सकती। इसतर परिणाम हम देख ही रहे हैं कि जब से हमने वैलिक अथवा मूल्यपरक शिक्षाको सिको किया और भौतिका विकास को समर्पित शिक्षा की महत्व दिया है, तब से समाज में कई विसंगतियाँ और धताएँ पैदा हो गयी हैं। दुराचार, भ्रष्टाचार, अत्याचार वे शब्द भले ही भित्र-भित्र हों लेकिन इनके उद्भव का मूल कारण तो नैतिक शिक्षा का अभाव ही है। विडंबना यह है कि इस स्थिति के शिकार तो सभी हो रहे हैं लेकिन समाधान के लिए जागरुकता पूर्ण प्रवास तनिक भी किसी भी स्तर पर नहीं दिखाई देते। क्या भौतिक विकास के साथ-साथ नैतिक विकास आवश्यक नहीं है? इस पर कोई विचार नहीं कर रहा है। नैतिकता विहीन समाज और राष्ट्र के सर्वांगीण विकास की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है। लेकिन हमने भौतिक विकास को इतना महत्व दिया है कि यह नैतिकता और मूल्य बोध की अवहेलना करके भी प्राप्त किया जा सकता है तो भी कोई बात नहीं। सोचिए, यह कितनी बड़ी भूल है। भूल ही नहीं यह बहुत बड़ी गलतफहमी ही है, जो हमें हर तरह से विनाश की ओर ही ले आएगी। भला इसे विकास कैसे मान लिया जाए? अतः में स्पष्ट कहूँ तो यह बात सच है कि नैतिक शिक्षा अपचा मूल्यपरक शिक्षा के चिना हर शिक्षा अधूरी है, वह एकांगी है। अतः समय रहते हमें सचेत हो जाना चाहिए।
नैतिक अथवा जीवन मूल्यपरक शिक्षा का मूल कार आज के समय में केवल बाल साहित्य हो सकता है, इसमें कोई संदेह नहीं। पहले प्रकारांतर से हमारा लोक ही हमारे बालों को नैतिक शिक्षा कई माध्यमों से सहज ही दे दिया करता था। आज वे स्थितियाँ और का परिवेश नहीं रह गया है। आज तो परिवार में बच्चों की कहानी और लोरी सुनाने के लिए दादी-नानी ही नहीं रह गयी है, फिर पाठ्‌यक्रम से नैतिक शिक्षा गायब हो गयी है। इसके अनेक कारण है, मैं उनकी गहराई में न जाते हुए अभिभावकने से ही आग्रह करूंगा कि वे अपने बच्चों को अनिवार्यतः बाल सुलभ बाल साहित्य उपलब्ध करवाएँ। निश्चित ही इससे आपके बालक एक अच्छे मनुष्य तो चनेंगे डी, राष्ट्र के उत्थान में भी अपनी महलम्पूर्ण भूमिका निभाएँगे। इस कार्य में हमारी शिक्षण संस्थाओं, अकादमियों, सामाजिक संगठनों, धर्म-अध्यात्म से जुड़े व्यक्तियों और सस्थानों को भी आगे आना होगा अन्यच्य वह कार्य केवल बाल साहित्य रचनाकारों एवं प्रकाशकों द्वारा संभव नहीं है। 

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